हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसानों को कर्जमुक्त, आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने का प्रभावी माध्यम है, जबकि रासायनिक खेती किसानों की लागत बढ़ाकर उन्हें कर्ज की ओर धकेलती है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दे रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा लागू की जाने वाली प्रत्येक योजना और नीति जनकल्याण को केंद्र में रखकर तैयार की जाती है। नई पहल का प्रारंभिक स्तर पर विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन किसानों को यह समझना चाहिए कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का उद्देश्य उनकी आय बढ़ाना, खेती की लागत घटाना और कृषि को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाना है।
श्री राणा ने कहा कि रासायनिक खेती में किसानों की कमाई का बड़ा हिस्सा उर्वरक, कीटनाशक और अन्य कृषि रसायन बनाने वाली कंपनियों के पास चला जाता है। इसके विपरीत प्राकृतिक खेती में बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है और किसान आर्थिक रूप से सशक्त बनता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती की तीन प्रमुख पद्धतियां प्रचलित हैं। जैविक खेती में अधिक मात्रा में गोबर एवं अन्य संसाधनों की आवश्यकता होती है, जबकि प्राकृतिक खेती कम लागत वाली, आत्मनिर्भर और पर्यावरण अनुकूल खेती की प्रणाली है। इसी कारण राज्य सरकार प्राकृतिक खेती के विस्तार के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।
कृषि मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी प्राकृतिक खेती को जनआंदोलन बनाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण, भूमि की उर्वरता बनाए रखने तथा आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्राकृतिक खेती समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विकसित भारत के संकल्प के अनुरूप वर्ष 2047 तक देश में प्राकृतिक खेती का दायरा 20 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि प्राकृतिक खेती की शुरुआत अपने पशुओं के चारे से करें और चारे के उत्पादन में भी कीटनाशकों के उपयोग से बचें। उन्होंने कहा, मैं स्वयं एक किसान हूं और खेती से जुड़ी चुनौतियों तथा किसानों की जरूरतों को भली-भांति समझता हूं।


